वक़्त के साथ यमुना का पानी बहता गया... पर नही बदली यमुना दिनों-दिन सूखती जा रही थी. और मटमैला और कालापन. यमुना की पहचान हो गई थी. सामने चबूतरे पर बैठा मै जब देखता हूँ यमुना को तुम्हारी याद में, तो यही लगता है की यमुना के पानी में अब भी कोई व्यथा-कथा शेष है. पता नही क्यों...जब भी यहाँ आता हूँ तो यमुना की तरह तुम्हारी याद पसरने लगती है अपने ही फैलाव में और तय करने लगती है कोई रास्ता, शायद यमुना की तरह तुम्हारी याद को भी किसी दरिया का इंतजार हो.......दिप्रेक
दिल्ली हादसों का नही इतिहास का शहर हैं...और यहाँ इतिहास किसी सल्तनत का नही शहर का हैं और शहर में कैद मुहब्बतों का है. हां, अपने पीछे छुट गए शहर के झरोंखों में झांकता हूँ तो तुम यादों की पोटली बन जाती हैं जिसे तुमने 'क्यूं' और 'क्या' के गिरह में बाँध रखा है.
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