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रविवार, 17 जून 2018

धरना @4 दिल्ली

दिल्ली के ऊपर जिसने भी राज किया वह इतिहास का हिस्सा होते गए। भाजपा के विजयरथ को आश्चर्यजनक ढंग से अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव में रोक दिया था। खैर उसके बाद यमुना का पानी और काला हुआ और दिल्ली लोकपाल के बगैर ही अपना जीवन गुआजरती रही। थोड़े बहुत उथल-पुथल के बाद सब कुछ पटरी पर चल रहा था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनाने की रिकार्ड तोड़ने में लगी थी कि कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद दिल्ली को पूर्ण राज्य देने की मांग शुरू हो गई। योन तो अरविंद केजरीवाल से पहले अटल बिहाती वाजपेयी के सरकार के समय18 अगस्त 2003 को गृह मंत्री रहते हुए लाल कृष्ण आडवानी ने संसद में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने का प्रस्ताव रखा था! वो प्रस्ताव संसद की कमिटी को दिया भी गया, जिसके चेयरमैन कांग्रेस पार्टी के नेता प्रणव मुखर्जी थे जो अभी इसी 7 जून को संघ के सम्मेलन में भाषण देने गए थे। उस समय प्रणव मुखर्जी ने भी माना था कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा मिलना चाहिए! खैर अब दिल्ली में सरकार कांग्रेस-भाजपा की नही आम आदमी पार्टी की थी और पूर्ण राज्य के मुद्दों दोनों मुख्य पार्टियों के राग कुछ और गीत गा रहे थे।

उस समय भी भाजपा खेमे से भाजपा नेताओ जैसे मदन लाल खुराना, साहेब सिंह वर्मा, विजय मल्होत्रा और डाक्टर हर्षवर्धन द्वारा समय-समय पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने की वकालत की जाती रही है! विजय गोयल भी जब दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भी यही सब कहा था

भाजपा नेताओं की टोली 15 साल से दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करते हुए कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थी,

दिल्ली की तत्काल मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने विधान सभा में दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे का प्रस्ताव रखा था! 2015 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने की बात कही थी और अब अरविंद केजरीवाल इसके लिए धरना पर बैठे हैं और उस वक़्त कोई धरना पर नही बैठा था। देखते है अब आगे क्या होता है....

शनिवार, 16 जून 2018

दिल्लीनामा-1

वक़्त के साथ यमुना का पानी बहता गया...  पर नही बदली यमुना दिनों-दिन सूखती जा रही थी. और मटमैला और कालापन. यमुना की पहचान हो गई थी. सामने चबूतरे पर बैठा मै जब देखता हूँ यमुना को तुम्हारी याद में, तो यही लगता है की यमुना के पानी में अब भी कोई व्यथा-कथा शेष है. पता नही क्यों...जब भी यहाँ आता हूँ तो यमुना की तरह तुम्हारी याद पसरने लगती है अपने ही फैलाव में और तय करने लगती  है कोई रास्ता, शायद यमुना की तरह तुम्हारी याद को भी किसी दरिया का इंतजार हो.......दिप्रेक 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

February

इन आँखों में कत्लेआम मचा है
यहां कौन दागी-बदनाम बैठा है.


शनिवार, 9 अप्रैल 2016

लड़कपन

हमसब राजा थे 
अपने-अपने हिस्से के 
अपने दिनों में 
जब हर तरफ बिखरा  रहता था  उत्साह 
और अंतिम थकान के  बाद भी 
बचा रह जाता था जोश  जिद की तरह 
तब खिड़कियाँ हुआ करते थे हमसब

और हमारी बातें रौशनदान

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

वह पेड़

ढेर सारी ट्रेनों की आवाजाही के बीच भी
वह खड़ा रहता है
और उसकी जड़ो को नही काट पाता
रेलगाड़ी का कोई पहिया
जैसे उसकी जड़े गहरे धंसी हो कही पाताल में
जो रोज ला देती है अँधेरा इस पृथ्वी पर
बहुत सारे उब के बाद भी
अपने इंतजार को वह टिकाये रखता है
उसकी पतियाँ बातें करती है चंद्रमा..तारे..नक्षत्रो से
और नीचे जड़ो तले कोई मजदूर
अनेक नाउम्मीदी के बाद भी सुखा रहा होता है
अपने उम्मीद का पसीना
बढ़ा रहा होता है कही धरती पर पानी का स्रोत
और छलक कर गिरने लगती है पतियों की हरियाली
प्लेटफोर्म की दुधियाँ रौशनी में नहाकर
तब अचानक कोई यात्री
ट्रेन छूटने की उदासी और इंतजार की उम्मीद के बीच से निकलकर
थाम लेता है उम्मीद का दामन
और सुबह चार बजकर तीस मिनट पर जानेवाली मालगाड़ी
(जो रोजाना पक्शिम से पूरब की ओर जाती है )
के साथ ही, वह झूम उठता है
जैसे अभी-अभी ख़त्म हुआ हो वर्षो का कोई इंतजार ...

हाँ अन्ना .....

हाँ अन्ना ,हो सके तो माफ़ करना
बहुत सारी उम्मीदों के बाद भी
हम नही तय कर सके जनांदोलन के बवंडर मे,
आप आंधी है या गाँधी?

हाँ, हम दृष्टिदोष से पीड़ित है
एक मोटी परत चढ़ गयी है आँखों पर
दिमाग में हमेशा घुमड़ते रहते है शक-व-संदेह के बादल
विश्वाश का क्या कहे वह कब का
रण छोड़ चूका है जन-आस के ही आगे
और लड़ने का जोश तो कैद हो गया है ''मौलिक अधिकारों'' में
भीड़ की शक्ल में हर इंसान अब, शकुनी सरीखा दिखता है
चूँकि सबके अपने-अपने कौरव और पांडव है
और पाल रखी है चाहत सबने पैगम्बर बनने की
और बहुत तो अमादा है इस बात पर की यही 'रामराज्य' होगा
और जो बच जाते है दो घटा दो के बाद शुन्य की तरह वह जन है ही कहा
जाहिर है एक बड़ा प्रश्न शुन्य की तरह गोल ही पड़ा है सदियों से
सबसे बड़े भ्रस्टाचार के रूप में
जिसकी हर लड़ाई ईमानदार महाभारत में
"अंगड़ाई का नक्शा बन-बनकर" खो देती है अपना वजूद भूख के आगे

हाँ अन्ना तुम्हारे समर्थन की बयार में
हमने देखे है दो तरह के लोग
एक वह जो खाए-पिए-अघाए है हमारी तरह
जिनकी पहचान ही आन्दोलन की आवाज है
और दूसरे वे जो पँक्ति में खड़े है सबसे पीछे
थोड़े सख्त और गुमसुम अपने मटमैले रंग में
जिन्होंने ठान लिया है दुनिया को मुक्त करना है कचरे के ढेर से
और चला रखा है आन्दोलन जो टंगा हुआ है पीठ पर बैताल की तरह
इस उदारवादी दुनिया में रोज कम होता जाता है उनके हिस्से का एक निवाला
हाँ अन्ना इस भारत में तुम्हारी लड़ाई भ्रस्टाचार से है सुविधाओ के भविष्य के लिये
और इस भारत में एक लड़ाई भूख की है वर्तमान से

हाँ अन्ना अब तुम कह सकते हो इस ग्लोबल वार्मिंग के दौर में
जब शुद्धता के जमने का समय है
तब क्यूँ डाल रहे हो जड़ों में मठा
और क्यों पैदा कर रहे हो वातारण में खटास

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

लडकपन

हमसब राजा थे
अपने-अपने हिस्से के
अपने दिनों में,
तब बिखरा रहता था उत्साह
हर तरफ,और
बचा रह जाता था जोश
अंतिम थकान के बाद भी,
उस वक़्त खिड़कियाँ हुआ करतें थे हमसब
और हमारी बातें रौशनदान

दूरी

अब जबकि हम सबसे नजदीक है


तब,सबसे अधिक दुरी है हमारे बीच


ठीक वैसे ही ,जैसे


एक गर्म चाय की प्याली और होंठो के बीच


हजारों मील की होती है


गुरुवार, 21 जुलाई 2011

वसंत

माँ
एक ऐसी वसंत है
जो ,हर पतझर में बचा लेती है
ममता भरी हरी पतियाँ
खिरनी की तरह
कभी पुरे नही झरते उसके पत्ते
और नही ख़त्म होती छाहं
उसकी कभी भी