ऐसा क्या था ?
तुम्हारी आवाज में ...
वह खींचता चला गया
हवा में फेंका नहीं था ...
तुमने अपने घर का पता....
वह सबसे पूंछता चला गया
....हाँ
तुम अब भी कहोगी
वह पागल था
दिल्ली हादसों का नही इतिहास का शहर हैं...और यहाँ इतिहास किसी सल्तनत का नही शहर का हैं और शहर में कैद मुहब्बतों का है. हां, अपने पीछे छुट गए शहर के झरोंखों में झांकता हूँ तो तुम यादों की पोटली बन जाती हैं जिसे तुमने 'क्यूं' और 'क्या' के गिरह में बाँध रखा है.
Popular Posts
-
अब जबकि हम सबसे नजदीक है तब,सबसे अधिक दुरी है हमारे बीच ठीक वैसे ही ,जैसे एक गर्म चाय की प्याली और होंठो के बीच हजारों मील की होती है
-
टप-टप ....... बारिश की बूंदों ने भिंगो दिया और सज गयी महफ़िल आँखों के आगे जब उतर आई थी बुँदे एक अनजान शहर से , गिरती रही गाते हुए राग-मल्हार...
-
इन आँखों में कत्लेआम मचा है यहां कौन दागी-बदनाम बैठा है.
-
दिल्ली के ऊपर जिसने भी राज किया वह इतिहास का हिस्सा होते गए। भाजपा के विजयरथ को आश्चर्यजनक ढंग से अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव में रोक ...
-
चाँद का तिरछापन खटकता नहीं है अब बेध जाता है कही गहरा ... ...........कैसे स्थिर नहीं रख पाता चाँद अपनी गोलाई ...? और तुम चुपचाप रख देती...
-
हमसब राजा थे अपने-अपने हिस्से के अपने दिनों में, तब बिखरा रहता था उत्साह हर तरफ,और बचा रह जाता था जोश अंतिम थकान के बाद भी, उस वक़्त खिड़किया...
-
ऐसा क्या था ? तुम्हारी आवाज में ... वह खींचता चला गया हवा में फेंका नहीं था ... तुमने अपने घर का पता .... वह सबसे पूंछत...
-
हमसब राजा थे अपने-अपने हिस्से के अपने दिनों में जब हर तरफ बिखरा रहता था उत्साह और अंतिम थकान के बाद भी बचा रह जाता था जोश जिद ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें