हमसब राजा थे
अपने-अपने हिस्से के
अपने दिनों में
जब हर तरफ बिखरा रहता था उत्साह
और अंतिम थकान के बाद भी
बचा रह जाता था जोश जिद की तरह
तब खिड़कियाँ हुआ करते थे हमसब
और हमारी बातें रौशनदान
दिल्ली हादसों का नही इतिहास का शहर हैं...और यहाँ इतिहास किसी सल्तनत का नही शहर का हैं और शहर में कैद मुहब्बतों का है. हां, अपने पीछे छुट गए शहर के झरोंखों में झांकता हूँ तो तुम यादों की पोटली बन जाती हैं जिसे तुमने 'क्यूं' और 'क्या' के गिरह में बाँध रखा है.
हमसब राजा थे
अपने-अपने हिस्से के
अपने दिनों में
जब हर तरफ बिखरा रहता था उत्साह
और अंतिम थकान के बाद भी
बचा रह जाता था जोश जिद की तरह
तब खिड़कियाँ हुआ करते थे हमसब
और हमारी बातें रौशनदान
ढेर सारी ट्रेनों की आवाजाही के बीच भी
वह खड़ा रहता है
और उसकी जड़ो को नही काट पाता
रेलगाड़ी का कोई पहिया
जैसे उसकी जड़े गहरे धंसी हो कही पाताल में
जो रोज ला देती है अँधेरा इस पृथ्वी पर
बहुत सारे उब के बाद भी
अपने इंतजार को वह टिकाये रखता है
उसकी पतियाँ बातें करती है चंद्रमा..तारे..नक्षत्रो से
और नीचे जड़ो तले कोई मजदूर
अनेक नाउम्मीदी के बाद भी सुखा रहा होता है
अपने उम्मीद का पसीना
बढ़ा रहा होता है कही धरती पर पानी का स्रोत
और छलक कर गिरने लगती है पतियों की हरियाली
प्लेटफोर्म की दुधियाँ रौशनी में नहाकर
तब अचानक कोई यात्री
ट्रेन छूटने की उदासी और इंतजार की उम्मीद के बीच से निकलकर
थाम लेता है उम्मीद का दामन
और सुबह चार बजकर तीस मिनट पर जानेवाली मालगाड़ी
(जो रोजाना पक्शिम से पूरब की ओर जाती है )
के साथ ही, वह झूम उठता है
जैसे अभी-अभी ख़त्म हुआ हो वर्षो का कोई इंतजार ...
अब जबकि हम सबसे नजदीक है
तब,सबसे अधिक दुरी है हमारे बीच
ठीक वैसे ही ,जैसे
एक गर्म चाय की प्याली और होंठो के बीच
हजारों मील की होती है
टप-टप .......
बारिश की बूंदों ने
भिंगो दिया
और सज गयी महफ़िल
आँखों के आगे
जब उतर आई थी बुँदे
एक अनजान शहर से ,
गिरती रही
गाते हुए राग-मल्हार,
और तुम्हारी याद का सितार
बजता रहा अपने ही धुन में,
फकत इतना की तुम न आयी
और बुँदे बारिश की
टप-टप ......
आती रही तुम्हारे ही दरिया से
चाँद का तिरछापन
खटकता नहीं है अब
बेध जाता है कही गहरा ...
...........कैसे
स्थिर नहीं रख पाता
चाँद अपनी गोलाई ...?
और
तुम चुपचाप
रख देती अपना हृदय
उस ताक पर
जहां कभी
चिराग जला करते थे |